[Intro] (Instrumental: Gentle piano melody layered with soft violin and acoustic guitar strums, creating a tender, yearning ambiance) [Verse 1] तारों ने लिखा तेरा नाम, रातों में छुपाया धुआँ मेरी चुप्पी भी गुनगुनी, तू हवा सा बनके रहा अनकहा हर साँस में तेरी ही गुंजन, पर तेरे होठों पे सन्नाटा मैं नूर की लकीर बन के, तेरे दिल के दरवाज़े पे रुकी हूँ... [Chorus] छू लो यारों मेरी परछाई को, इक इशारा भर दे ज़रा मेरे ख्वाबों के शहर में, तू न आए तो फिर क्या सहरा? ये फ़ितूर है या इश्क़ मेरा, रुक-रुक के दमकता है चिराग़ तू नजरों से बयाँ कर दे, मैं हूँ तेरी ही राहों का पत्थर... [Verse 2] तेरी चुप्पी के साये में, मेरे अरमान सुलगते हैं हर ग़ज़ल को तेरे नाम कर, मैं हवाओं में बिखरती हूँ तू जहाँ से गुज़रे वही, मेरी आँखों का मौसम रुका तेरे बिन ये ज़माना सूना, मैं तुझी में हूँ बसकर अधूरी... [Bridge] (Instrumental: Violin swells with orchestral undertones, evoking a surge of emotion) बरसों की ये बूँदें, तेरे दरिया में मिलने को तरसी मैं एक शमा हूँ तूफ़ान में, जलके भी तेरा इंतज़ार करूँ न लिखा खत मेरा कोई, न इकरार मेरा तुझ तक पहुँचा मगर दिल की हर धड़कन कहती, तू ही मेरा सुकून है अब तक... [Chorus] छू लो यारों मेरी परछाई को, इक इशारा भर दे ज़रा मेरे ख्वाबों के शहर में, तू न आए तो फिर क्या सहरा? ये फ़ितूर है या इश्क़ मेरा, रुक-रुक के दमकता है चिराग़ तू नजरों से बयाँ कर दे, मैं हूँ तेरी ही राहों का पत्थर... [Outro] (Instrumental: Fading piano notes intertwined with a solitary violin, leaving a lingering echo of unresolved longing)